भोजपुरी गीतों के इतने प्रकार होते हैं, आने वाली पीढियां शायद ही याद रख पाएं

May 9, 2020
Lifestyle , Music
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साल 2020 में बिहार के किसी बच्चे से अगर आप भोजपुरी गीत के बारे में पूछ दें तो अमूमन वो इसपर कुछ कहने से बचेगा। और अगर वो कुछ बोलता भी है तो बस तीन नाम ही बोल पायेगा। और वो तीन नाम खेसारी लाल यादव, पवन सिंह और निरहुआ होगा। इसके बाद अगर आपने उससे पूछ दिया कि भोजपुरी में गीत कितने प्रकार के होते हैं तो वो शायद चाहकर भी कुछ नहीं बोल पायेगा। क्योंकि ना तो किसी ने उसे आज तक यह बताया, ना तो वो कहीं यूट्यूब या सोशल मीडिया पर इसका जिक्र पाता है। और भोजपुरी संगीत की किताब तो उसके सिलेबस में ही नहीं है। तो कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि भोजपुरी में उसे भद्दे गीतों के अलावा कुछ नहीं पता।

चलिये, आज आपको बताते हैं कि भोजपुरी जोकि भारत के चार राज्यों के कुल 40 जिलों और दुनिया के बारह देशों में बोली जाती है, जिसके बोलने वालों की संख्या भारत में 15 करोड़ और पूरी दुनिया में 22 करोड़ है, उस भाषा में जो गीत-संगीत है, उसमें कितने प्रकार हैं।

भोजपुरी संगीत को मुख्यतः 10 हिस्सों में बांटा जा सकता है। लेकिन अगर पूरी तरह इसका वर्गीकरण किया जाए तो यह 50 से भी ज्यादा होते हैं।

● मंगल गीत - मंगल यानी शुभ। ऐसे गीत जो किसी शुभ कार्य जैसे शादी विवाह, बच्चे का जन्म या कोई भी शुभ अवसर पर गाया जाए तो उसे मंगल गीत कहा जाता है। इसके तीन प्रकार होते हैं। मंगल चरण गीत, मांगलिक गीत और आशीष गीत।

●आवाहन गीत - आवाहन का अर्थ होता है बुलाना, नेवता देना। हिन्दू सभ्यता संस्कृति में पूर्वजों को पितृ बोला जाता है। किसी भी शुभ कार्य में पितृ को जरुर बुलाया जाता है। तो, वो गीत जिन्हें गाकर देवता और पितृ को बुलाया जाता है, उन्हें आवाहन गीत कहते हैं। इसमें सांझा प्रात का बड़ा महत्व है। उन देवता और पितृ को बुलाने के लिए जो गीत सुबह गाये जाते हैं उन्हें प्रात और शाम को गाये जाने वाले गीत को सांझा कहते हैं। इसके भी तीन प्रकार हैं। सांझा प्रात गीत, मातृपूजा गीत और पितृ गीत।

●भक्ति गीत - भक्ति गीत भोजपुर समाज में वह माध्यम माना जाता है, जिसे गाकर लोग अपने इश्वर को प्रसन्न करते हैं। जैसे तुलसीदास के अवधी रामायण के चौपाई गाये जाते हैं, वैसे ही भोजपुरी में भक्ति गीत चौपाई के रुप में गाये जाते हैं। रामायण और शास्त्रार्थ गायकी भोजपुरी में शुरू से रही है, और यह भक्ति गीत कहलाता है। दोहा भी इसका एक प्रचलित रुप है। इसमें कीर्तन एक बेहद सामान्य प्रकार है, जिसे षोडस मंत्र भी कहा जाता है। "हरे राम हरे रामा, हरे कृष्ण हरे कृष्ण" को संगीत के साथ गाया जाता है। यह चौबीस घंटे से लेकर सात दिनों तक चलता है। भक्ति गीत के श्रेणी में पचरा गीत है जिसे गाकर देवी माँ को खुश करते हैं, देव वर्णन गीत है, जिसमें देवताओं का व्याख्यान किया जाता है साथ ही रामायण और महाभारत की चौपाई भी गायी जाती है, शीतला माता गीत जोकि चईत की नवमी को गाया जाता है और तुलसी गीत भी होता है।

●छठ गीत - इससे शायद हम सभी परिचित होंगे। क्योंकि यह हमारे जीवन से सीधे संबंधित है। डूबते सूरज के लिए जो गीत गाये जाते हैं, वही छठ गीत कहलाते है। इसमें नहाए खाए से लेकर सुबह के सूर्य अर्घ्य तक अलग अलग तरह से गाया जाता है। भोजपुर समाज मे मुख्यतः साल में दो बार छठ मनाया जाता है जोकि चईत छठ और कार्तिक छठ है। पर भोजपुर के कुछ हिस्से जैसे गोपालगंज और गोरखपुर के इलाकों में भादो छठ भी होता है जोकि अमूमन अगस्त या सितम्बर में मनाया जाता है।

●संस्कार गीत - किसी भी मनुष्य के जिन्दगी में तीन उत्सव मनाये जाते हैं। जन्म, विवाह और मृत्यु। बच्चे के जन्म के समय जो गीत गाये जाते हैं, उसे सोहर कहते हैं. जन्म के छठे दिन छट्ठी गाया जाता है, फिर बच्चा खेलाते समय खेलवना गाया जाता है, बच्चा जब चलने लगता है तब बढ़ाव गीत गाया जाता है, बच्चे को सुलाने के लिए लोरी गाया जाता है, मुंडन गीत और जनेऊ गीत भी भोजपुर समाज में संस्कार गीत ही माना जाता है।

इसके बाद विवाह के समय हल्दी गीत, मंडप गीत, गाली गीत, द्वार पूजा गीत, कोहबर गीत और बिदाई गीत बहुत प्रचलित है।

●निर्गुण गीत - निर्गुण का अर्थ होता है, जिसमें कोई गुण न हो। हिन्दू धर्म में यह माना जाता है कि मनुष्य तीन गुणों के अधीन होता है। रजो गुण, तमो गुण और सतो गुण। जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो वो इन सभी गुणों से मुक्त हो जाता है। तब वो निर्गुण की अवस्था में पहुंच जाता है, और तब जो गीत गाये जाते हैं वही निर्गुण कहलाते हैं। मरने के समय और उसके बाद जो गीत गाये जाते हैं, उन्हें भी निर्गुण कहा जाता है। निर्गुण की शुरुवात कबीरदास ने की थी और मौजूदा समय में इसकी शुरुवात भोजपुरी के भीष्म पितामह कहे जाने वाले भरत शर्मा व्यास ने 1992 से की थी।

●ऋतु गीत - भोजपुरी में हर महिने, हर मौसम के लिए अलग अलग गीत गाये जाते हैं। शुरुवात चईता से होती है और अंत फगुवा से हो जाती है। इसमें झूमर, पवरिया, कजरी, गोधन, महुरा, फगुवा, चईता, जोगिरा और डफ गीत आते हैं। सावन में कजरी गाया जाता है तो भाई दूज के दिन गोधन।

चौमासा चार महिने के मौसम के लिए गाया जाता है और ब्रह्ममासा बारह महीनों के लिए गाया जाता है।

●श्रम गीत – हमारा समाज आदि काल से खेतिहर रहा है। खेती ही मुख्या पेशा रहा और इससे जुड़े हर काम में शारीरिक श्रम लगता है, इसलिये समाज ने हर तरह के श्रम के लिए गीत इजाद किया। इसमें जोठर गीत, रोपनी गीत, कटनी गीत, सोहनी गीत और गोंड गीत होते हैं। जब खेतों में बीज रोपे जाते हैं तब रोपनी गीत गाया जाता है, जब धान की कटाई होती है तब कटनी गीत गाये जाते हैं, जब गेहूं को पिसा जाता है तो जोठर गीत गाया जाता है, जब फसल बड़े होते हैं तो उसके अगल बगल घास उगते हैं उन्हें गावँ की महिलायें उखाड़ देती है, तब सोहनी गीत गाये जाते हैं। ऐसे ही हर श्रम के लिए गीत है।

●पूरबी - समाज के मर्द शुरू से ही कमाने और व्यापार करने पूरब यानी कोलकात्ता या पटना जाते रहे हैं। जब पुरुष अपनी पत्नी को छोड़ चले जाते थे महीनों और सालों के लिए, तब वो महिला अपने पति के विरह में जो गीत गाती थी, वही पूरबी कहलाया। छपरा के महेंद्र मिसिर पूरबी सम्राट कहे जाते हैं।

●लोकगीत – आम जनमानस से जुड़े जितने भी गीत गाये जाते हैं वो सब लोकगीत कहलाते हैं। भिखारी ठाकुर के अधिकतर नाटकों में लोकगीत सुनने को मिल जायेंगे। समाज से जुड़े हर मुद्दे पर जो गीत गाये जाते है वही लोकगीत है। इसमें सबसे प्रसिद्ध श्रृंगार गीत है जो महिलाओं के श्रृंगार से संबंधित है।

आने वाले दिन भोजपुरी समाज के लिए बहुत खतरनाक हैं। 29 करोड़ की आबादी अब कुछ मुट्ठी भर गायकों को सुनती है, जिन्हें ना तो भोजपुरी का कुछ पता है ना तो भोजपुरी संगीत का। अपनी धरोहर को बचाना हमारी जिम्मेदारी है ताकि अपनी आने वाली पीढ़ी को यह समृद्ध विरासत दे सकें।

(उदीप्त आर्यन की पुस्तक "भरत शर्मा व्यास - द मैन ऑफ़ फ़ोक वाइस" से लिया गया अंश)

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