सामजिक मर्यादाओं में घिरे प्रेम की रूमानियत अभिव्यक्ति: फरवरी नोट्स- रामकिशोर उपाध्याय

January 6, 2021
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Patna: कहानी कहना और सुनना हमारी आदिम स्वभाव है ,इसलिए हर भाषा में कथा साहित्य प्रचुरता से मिलता है। भारत में भी इसकी समृद्ध  परंपरा है और हम सब दादी और नानी की कहानी सुन कर ही बड़े हुए । लेकिन उपन्यास का जन्म आधुनिक काल मे हुआ । हेगेल और लुकाच जैसे विचारकों के अनुसार उपन्यास महाकाव्य (इपिक ) का सब्स्टीटूट है। उपन्यास लेखन की इसी परंपरा को समृद्ध  करता डॉ. पवन विजय का दूसरा उपन्यास ‘फरवरी नोट्स’ है। 

जिन्होंने डॉ पवन विजय का पहला उपन्यास ‘बोलो गंगापुत्र’ पढ़ा होगा उनकी इस उपन्यास को लेकर यह जिज्ञासा अवश्य ही होगी कि क्या लेखक अपने पूर्व प्रकाशित उपन्यास ‘बोलो गंगापुत्र’ की तरह ‘फरवरी नोट्स’ में कुछ नयापन लेकर आया है ? क्या उन्होने घटनाएं श्रृंखला में बांधकर प्रस्तुत की गई और उनमें मानव जीवन का कितना कलात्मक चित्रण है ? क्या यह उपन्यास मनुष्य की आदिम कोतुहल प्रवृत्ति को जागृत करता है ? अर्थात इसकी कथावस्तु कैसी है ,कथा का स्रोत कैसा है ? क्या यह कृति किसी कालखण्ड की सशक्त अभिव्यक्ति है? कथानक के शब्द सार्थक है या नहीं ? पात्र काल्पनिक है या वास्तविक ? संवाद कैसे हैं ? उपन्यास के विकास की प्रकिया स्थिर या गतिशील है ? इन्हीं कुछ मौलिक बिंदुओं पर पाठक और आलोचक किसी उपन्यास का मूल्यांकन करता है।

मेरे विचार से इसके शीर्षक से लेकर विषय निर्धारण में नूतनता है। इसका शीर्षक ही बिल्कुल अलहदा किस्म का है और पाठक की रुचि को उत्तेजित करता है। आखिर क्या है इस ‘फरवरी नोट्स’ में ? किसी जासूस के नोट्स या गोपनीय सरकारी फ़ाइल के पन्ने जो किसी किसी रहस्य को समेटे हो? कुछ इसी तरह के प्रश्न पाठक की जिज्ञासा को ठीक वैसे ही जागृत करते है जैसे कोई बच्चा अपने जन्मदिन पर पिता के हाथ में एक सुंदर पैकेट को देखता है और उस अज्ञात उपहार को खोलने के लिए उत्सुक हो उठता है।

इस उपन्यास की पृष्ठभूमि आधुनिक सोशल मीडिया युग है। उपन्यास का आरंभ भी फेसबुक मेसेंजर पर उपन्यास नायिका द्वारा नायक भेजे गए मित्रता के निवेदन से होता है | हम सब जानते है कि आजकल सोशल मीडिया हमारे जीवन का अंग बन चुका है। जब हम चाहकर इससे मुक्त नहीं हो सकते तो इसी में जीवन को तलाशना, तराशना और इसकी विसंगतियों के साथ जीना हमारी विवशता भी है और आवश्यकता भी है। लेखक ने अपने मुख्य पात्र समर  और आरती  इसी सोशल मीडिया से चुने जो उसका अधिकार है और ये बिल्कुल काल्पनिक नहीं है। सोशल मीडिया के माध्यम से आये दिन देश, समाज और जाति धर्म के बंधन को तोड़कर लोगों का मिलना, विवाह करना आज आम बात हो गयी है। उपन्यास के ये पात्र वास्तविक जीवन में हमारे इर्द-गिर्द मौजूद हैं। सभी पात्र स्थिर नहीं है, अपितु निरंतर गतिशील हैं।

लेखक  इसी  मूल तत्व के इर्द-गिर्द उपन्यास का ताना बाना फैलाता  है। यहां एक सामाजिक प्रश्न सिर उठाकर खड़ा हो जाता है कि जब दोनों पात्र विवाहित है तो उन्हें प्रेम की चाहत में इस बन्धन के इतर क्यों जाना चाहिए? इसका उत्तर मनोविज्ञान में छिपा है। प्रेम ही जीवन का शाश्वत भाव है। समस्त चराचर जगत की व्युत्पत्ति का कारक प्रेम है तभी तो पशु पक्षियों से लेकर देवता,मानव,किन्नर ,यक्ष और राक्षसों तक सभी प्रेम के सागर में निरंतर गोते खाते रहते हैं और आनंद की अनुभूति में सदा निमग्न रहना चाहते हैं। प्रेम प्रकृति-सृजन की अनिवार्यता  है।   प्रेम की अभिपूर्ति केवल वैवाहिक संबंधों में ही हो सकती है? क्या प्रेम मात्र दैहिक संतुष्टि तक ही सीमित है ? पश्चिम के विद्वानों ने भी इसका उत्तर खोजने का प्रयास किया। प्लेटोनिक लव जैसी अवधारणा भी आई ।

हमारे इतिहास और साहित्य में कई ऐसे  पौराणिक चरित्र विद्यमान है जो विवाहेत्तर संबंधों को निभाते रहे । किन्तु वर्तमान सामाजिक मूल्य  विवाहित स्त्री और पुरुष को  किसी अन्य से प्रेम करने की अनुमति नही देते पर  लेखक ने एक अलग  दृष्टिकोण समाज और पाठकों के समक्ष रखा  । उसके मुख्य पात्र समर और आरती  एक दूसरे के साथ प्रेम में गुथे हुए है | वे मिलन के लिये कुंवारों की तरह व्यग्र दिखाई देते हैं और   रेज़र-एज पर चलने जैसा कार्य  करते हैं लेकिन जैसा अक्सर होता है कि प्रेमिल भावनाएं  छिपाये नहीं छिपतीं । यहां भी ऐसा ही हुआ । उनका यह प्रेम ज्यादा देर तक परिवार से नहीं छुपा। समर की पत्नी उसके  चेहरे पर चढ़ी प्रेम की परतों को पहचान लेती है और फुल पब्लिक व्यू में उन्हें समर की आत्मा से प्याज के छिलकों की तरह अनावृत कर देती है तथा  एक विजेता की तरह अनुभव करती है। पात्रों का इस तरह का आचरण कतई बनावटी नहीं है। रोज इस तरह की घटनाएं आम हैं। संवादों की भाषा सरल और सहज है। सार्थकता लिए हुए संवादों में अनावश्यक शब्दो का आडम्बर नहीं है,किन्तु उनमें भाषा की प्रांजलता हैं | भाषा का सौंदर्य और साहित्यिक प्रतिमानों का बेहतर प्रयोग किया ज्ञ है । एक बानगी उनके संवादों की ...............

“जो भी हो उसे महसूस करो पर हमारी भावनाओं में कोई खराबी नहीं है |समर कुछ सवालों के जवाब ग्रामर और सेंटेंस के सहारे नहीं दिए जा सकते | उनके तौर-तरीके अलग होते हैं जिन्हें समझने के लिए स्पेशल अप्रोच की जरूरत होती है |दुनियावी तरीके से दुनिया में बातों को ही जाना जा सकता है |’ आरती के स्वरों में गंभीरता थी |

“ मैं अपने गांव में पहुंच गया...... वही भागा जा रहा हूं...... कच्चे मेडों पर फिसलते हुये भीगती धूप और हल्की होती बरसात में सनी शाम के पीछे .... पकड़ना चाहता हूँ .... शाम आस पास की झाड़ियों में छुप जाती है और मैं ज़ोर से टीप मारना चाहता हूं ....... शाम लड़की बन कर हँसती है मुझ पर |  आसमान से इंद्रधनुष के फूल झरते हैं | फूलों को बटोर कर गांव के ताल में सिरा देता हूं | शाम ताल  को चूम लेती है……. ताल लजाधुर ब्याहता हो जाती हैं”

; आधी रात के बाद हल्की सर्द भरी हवाओं के परों पर बैठकर गुलाबी गंध जब लिपटने लगी तो एकबारगी लगा कि तुम पास में हो पर यह गंध मोबाइल से आ रही थी | देखा तो फेसबुक पर कुछ उनींदे मुंह से मुंह लगाए कुछ बात कर रहे थे | उनकी बातों में मोहब्बत की खुशबू थी जिसकी वजह से मौसम की ठंड गुलाबी होती जा रही थी इस गुलाबी खुशबू में रंग है, स्वाद है, रस है, खुशी है, इश्क है|  यही खुशबू तो पूरे बरस को रंगती है, धूप को  मीठा करती है दिलों को कोमलता से छूती है उन्हें धड़कना सिखाती है...................... |”

भारत में बसंत माह कामदेव के पूर्ण जागृत होने का समय होता है, जब गुलाबी ठंड मानव-हृदय में कामदेव को प्रेम-पुष्प पल्लवित करने हेतु एक उपयुक्त परिवेश तैयार करते है तो वहीं पश्चिमी सभ्यता में भी लगभग उसी समय चौदह  फरवरी को ‘वैलेंटाइन डे’ मनाया जाता है अर्थात प्रेम को उल्लासपूर्ण व्यक्त करने का अवसर | उपन्यासकर डॉ. पवन विजय ने अपनी कल्पना शक्ति का परिचय देते हुए प्रेम संबंधी दो संस्कृतियों का सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है | क्योंकि प्रेम कभी मिटता नहीं और न ही कभी मरा करता है | प्रेम अमर होता है अतः फरवरी के दो दिन नायक नायिका के लिए अपने प्रेम में सुरक्षित कर लेते हैं |

उपन्यास पढ़ते –पढ़ते एक सामान्य पाठक को यह लगेगा कि आरती  और समर सब बंधनों को तोड़ देंगे और एक दूजे के लिये हो जाएंगे। किन्तु वे एक कहानी की हैप्पी एंडिंग के बजाय जब यह पढ़ते  है कि नायक और नायिका इससे अलग निर्णय करते हैं। वे अपनी अपनी कारा को तोड़ते हैं और अपने-अपने जीवन साथी से अलग भी हो जाते हैं किंतु एक दूजे के साथ न रहकर अपने प्रेम का सम्मान करते हुए अलग अलग हो जाते है। यह एक अप्रत्याशित बात  है। यही कहानी में ‘ट्विस्ट इन दा टेल’ है,जिसे उपन्यासकार ने बड़ी चतुराई से बुना है।  अब क्या होगा ? यह उत्सुकता पाठक के मन में अंत तक बनी रहती है और उस उत्सुकता को बनाए रखें में मुझे उपन्यासकर पवन विजय सफल होते प्रतीत होते है |

इस उपन्यास की एक और विशेषता ने मुझे प्रभावित किया वह यह है कि यहाँ भावों के अतिरेक में मुख्य पात्र प्रेम- पीड़ित होते हुये भी  सामाजिक मर्यादा को कभी नहीं तोड़ते है और अपने- अपने वैवाहिक सम्बन्धों को त्यागने तक वे अपने –अपने परिवार के प्रति उत्तरदायी बने  रहते हैं ।मेरे विचार से शीर्षक से लेकर अपनी सरल,सहज और संप्रेषणीय भाषायुक्त संवादशैली,कथाशिल्प और मजबूत कथावस्तु के आधार पर यह कुल मिलाकर एक अच्छा प्रेम उपन्यास है जो पाठकों को विचार के अलग धरातल पर ले जाकर उन्हें बांधे रखने में सफल होता है | फरवरी नोट्स की अपार सफलता के लिए डॉ पवन विजय को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूँ |

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